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आकाश मिसाइल प्रणाली ने हालिया हमलों को नाकाम कर देश की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाई है। पाकिस्तान से आने वाले ड्रोन और मिसाइलों को आकाश ने पल भर में ढेर कर दिया। इस बात की ख़बर आकाश मिसाइल डिफेंस सिस्टम को बनाने वाले डॉ. प्रहलाद रामाराव को हुई तो उनकी आंखों के खुशी के आंसू बहने लगे। आकाश प्रोजेक्ट के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रह चुके पद्मश्री डॉ. रामाराव के लिए ये एक भावनात्मक पल था कि उनकी टीम द्वारा बनाया गया ये एयर डिफेंस सिस्टम देश के काम आ रहा है।
डॉ. प्रहलाद रामाराव: एक वैज्ञानिक की यात्रा
डॉ. प्रहलाद रामाराव का आकाश मिसाइल के साथ सफर भारत के मिसाइल विकास प्रयासों के शुरुआती वर्षों में शुरू हुआ। उन्हें भारत के ‘मिसाइल मैन’ और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा आकाश कार्यक्रम के लिए सबसे कम उम्र के प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में नियुक्त किया गया था। उस समय, भारतीय सेना इस प्रणाली की व्यवहार्यता को लेकर संदेह में थी।
डॉ. रामाराव ने बताया कि 1983 में उन्हें इस प्रोग्राम का प्रोजेक्ट डायरेक्टर बनाया गया। यह एक मुश्किल प्रोजेक्ट था। जब वे यह मिसाइल तैयार कर रहे थे, तो उन्होंने सोचा कि इसमें गति, चुस्ती, मारक क्षमता और इंटेलिजेंस का होना बहुत ज़रूरी है। शुरुआत में कई नाकामियां मिलीं, लेकिन डॉ. अब्दुल कलाम ने उन्हें प्रोत्साहित किया और विश्वास दिलाया कि वे एक दिन जरूर कामयाब होंगे।


मुख्य विशेषताएं:
- दूरी और गति:
आकाश मिसाइल की मारक दूरी 25 से 30 किलोमीटर तक है और यह मैक 2.5 (आवाज़ की गति से ढाई गुना तेज़) तक उड़ सकती है। - वारहेड:
इसमें 60 किलोग्राम का उच्च विस्फोटक वारहेड लगा होता है, जो निकटता फ्यूज से सक्रिय होता है। - मार्गदर्शन प्रणाली:
यह कमांड गाइडेंस और टर्मिनल फेज में सक्रिय रडार होमिंग का उपयोग करती है। - गतिशीलता:
आकाश प्रणाली ट्रक या ट्रैक वाहन पर तैनात की जा सकती है, जिससे यह हर प्रकार के इलाके में आसानी से ऑपरेशन कर सकती है।
प्रमुख घटक:
- राजेन्द्र रडार:
यह एक मल्टी-टारगेट ट्रैकिंग और फायर कंट्रोल रडार है जो एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है। - लॉन्च प्लेटफॉर्म:
थलसेना के लिए यह BMP-2 और T-72 प्लेटफॉर्म पर आधारित है, जबकि वायुसेना के लिए इसे TATA के 8×8 ट्रक पर तैनात किया जाता है। - कमांड एंड कंट्रोल:
यह एक सामरिक नियंत्रण केंद्र से संचालित होती है, जो पूरी बैटरी के संचालन को निर्देशित करता है।


संचालन और इतिहास:
2009 में भारतीय वायुसेना और थलसेना में शामिल की गई आकाश प्रणाली ने सोवियत युग की पुरानी प्रणालियों को सफलतापूर्वक प्रतिस्थापित किया। दिसंबर 2023 में ‘अस्त्रशक्ति’ अभ्यास के दौरान इसने एक साथ चार हवाई लक्ष्यों को 25 किमी की दूरी पर नष्ट कर अपनी दक्षता का प्रदर्शन किया।
वेरिएंट्स:
- आकाश-1S:
इसमें स्वदेशी विकसित सीकर लगा है, जिससे टारगेटिंग और अधिक सटीक हो गई है। - आकाश प्राइम:
इसमें बेहतर एक्टिव रडार सीकर है और यह ऊंचाई और ठंडे इलाकों में भी बेहतर प्रदर्शन करती है। - आकाश-NG (न्यू जेनरेशन):
यह उन्नत संस्करण है जिसकी रेंज 70–80 किमी है और इसमें डुअल-पल्स रॉकेट मोटर व एडवांस रडार सिस्टम है।
निर्यात और वैश्विक रुचि:
दिसंबर 2020 में भारत सरकार ने आकाश मिसाइल सिस्टम के निर्यात को मंजूरी दी थी। अर्मेनिया सहित कई देशों ने इसमें रुचि दिखाई है और कुछ सौदों पर हस्ताक्षर भी हो चुके हैं।
निष्कर्ष:
आकाश मिसाइल प्रणाली न केवल भारत की आत्मनिर्भर रक्षा क्षमताओं का प्रतीक है, बल्कि यह आने वाले वर्षों में भारत के रक्षा निर्यात का एक मजबूत स्तंभ भी बन सकती है। यह प्रणाली दुश्मनों के हवाई हमलों को रोकने में भारत को रणनीतिक बढ़त देती है।
Puja Verma
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