US Snubs Pakistan Global Minerals Conference 2026: अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में आयोजित होने वाली ‘ग्लोबल मिनरल्स कॉन्फ्रेंस’ (Global Minerals Conference) ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक स्पष्ट संदेश दे दिया है। एक तरफ भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान को इस लिस्ट से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। यह पाकिस्तान के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि पिछले कई महीनों से शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर ‘सेल्समैन’ की तरह अमेरिका के चक्कर काट रहे थे।
1. सूटकेस में ‘खजाना’ लेकर गए थे मुनीर-शहबाज
पाकिस्तान की बदहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पीएम शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने एक नया दांव खेला था।
- सैंपल की नुमाइश: पिछले साल ये दोनों दिग्गज व्हाइट हाउस पहुंचे थे और तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रेयर-अर्थ मिनरल्स (Rare-Earth Minerals) का एक कीमती बॉक्स भेंट किया था।
- चीन का विकल्प बनने का दावा: पाकिस्तान का दावा था कि उसके पास दुर्लभ खनिजों का भंडार है और वह अमेरिका के लिए चीन का विकल्प बन सकता है। लेकिन वॉशिंगटन ने उनके इन दावों को ‘कचरे के डिब्बे’ में डाल दिया।
2. चापलूसी भी नहीं आई काम
पाकिस्तान ने अमेरिका को रिझाने के लिए हर संभव कोशिश की। सेना प्रमुख मुनीर ने कई मंचों पर अमेरिकी माइनिंग कंपनियों को साझेदारी का न्योता दिया। उनका तर्क था कि पाकिस्तान के पास रणनीतिक खनिजों का बड़ा जखीरा है, जिससे अमेरिका की चीन पर निर्भरता कम हो सकती है।
सड़वी हकीकत: कॉन्फ्रेंस में आमंत्रण न मिलना यह साबित करता है कि अमेरिका को पाकिस्तान की खनिज क्षमता या उसकी स्थिरता पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है।
3. US Snubs Pakistan Global Minerals Conference 2026: भारत का बढ़ता कद और जयशंकर का जलवा
जहां पाकिस्तान को दरवाजे पर भी नहीं खड़ा होने दिया गया, वहीं भारत को इस वैश्विक सम्मेलन में सम्मान के साथ आमंत्रित किया गया है।
- रणनीतिक साझेदारी: अमेरिका भारत को खनिजों की सप्लाई चेन (Critical Minerals Partnership) में एक भरोसेमंद साथी मानता है।
- एस. जयशंकर की मौजूदगी: भारतीय विदेश मंत्री का इस बैठक में होना यह दर्शाता है कि दुनिया भविष्य की तकनीक और संसाधनों के लिए भारत की ओर देख रही है, न कि पाकिस्तान की ओर।
4. यह सिर्फ खनिज नहीं, विश्वसनीयता की बात है
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह फैसला दो बातों को साफ करता है:
- अस्थिरता: पाकिस्तान की राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता के कारण कोई भी बड़ी शक्ति वहां निवेश का जोखिम नहीं लेना चाहती।
- विश्वसनीयता: पाकिस्तान के ‘सैंपल’ और ‘सूटकेस’ वाली कूटनीति काम नहीं आई, क्योंकि वैश्विक बाजार केवल दावों पर नहीं, बल्कि साख (Credibility) पर चलता है।
वॉशिंगटन से आई यह खबर पाकिस्तान के लिए एक करारा तमाचा है। अपनी इज्जत बचाने के लिए खनिजों का डिब्बा लेकर घूमे शहबाज-मुनीर को अब यह समझ लेना चाहिए कि दुनिया ‘चापलूसी’ से नहीं, ‘क्षमता’ से चलती है। भारत के सामने पाकिस्तान की यह अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती एक बार फिर साबित करती है कि वैश्विक मंच पर असली ‘खिलाड़ी’ कौन है।
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