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Nepal’s Political Crisis: आर्मी और Gen-Z की बैठक से क्या निकलेगा अगला रास्ता?

Nepal's Political Crisis

Nepal’s Political Crisis: नेपाल इस समय एक गहरे राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बाद सत्ता का शून्य बना हुआ है और पूरा देश जानना चाहता है कि आगे का नेतृत्व कौन करेगा। हाल ही में नेपाल आर्मी हेडक्वार्टर में हुई बैठक ने इस संकट को और दिलचस्प बना दिया है। इस बैठक में सेना प्रमुख, राष्ट्रपति, पूर्व न्यायाधीश, समाजसेवी और Gen-Z आंदोलन के प्रतिनिधि शामिल हुए। खास बात यह रही कि Gen-Z की तरफ से कुलमन घिसिंग का नाम अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर सुझाया गया।

आइए विस्तार से समझते हैं कि नेपाल की मौजूदा स्थिति क्या है, बैठक में क्या हुआ और आगे कौन-कौन से रास्ते निकल सकते हैं।

नेपाल का मौजूदा संकट

नेपाल में लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। सरकारें आधे कार्यकाल से ज्यादा नहीं टिक पातीं। हाल की घटनाओं ने इस अस्थिरता को और बढ़ा दिया।

  • जनता सड़कों पर है।
  • युवाओं की नई पीढ़ी, जिसे Gen-Z कहा जा रहा है, लगातार बदलाव की मांग कर रही है।
  • हालिया विरोध प्रदर्शनों में कई छात्रों की मौत हुई, जिससे माहौल और भड़क गया।
  • प्रधानमंत्री को भारी जनविरोध और राजनीतिक दबाव के चलते पद छोड़ना पड़ा।

आर्मी हेडक्वार्टर में बैठक क्यों अहम है?

नेपाल में सेना पारंपरिक रूप से राजनीति में सीधे हस्तक्षेप से बचती आई है। लेकिन जब हालात बिगड़ते हैं और राजनीतिक दल समाधान नहीं निकाल पाते, तब सेना मध्यस्थ की भूमिका निभाती है।

इस बार भी ऐसा ही हुआ।

  • सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल ने राष्ट्रपति से बातचीत की।
  • उन्होंने Gen-Z नेताओं, समाजसेवी दुर्गा प्रसाई और पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की को बुलाकर बैठक की।
  • लक्ष्य था – एक ऐसा अंतरिम नेतृत्व खोजना जो जनता को स्वीकार्य हो और संवैधानिक रूप से भी सही साबित हो।

Gen-Z की बढ़ती ताकत

नेपाल का यह संकट केवल राजनीतिक दलों की नाकामी नहीं दिखाता, बल्कि यह भी बताता है कि अब युवाओं की नई पीढ़ी सीधे सत्ता में हिस्सेदारी चाहती है।

  • Gen-Z का आंदोलन सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों तक पहुंचा।
  • उन्होंने भ्रष्टाचार और पुराने नेताओं के खिलाफ आवाज़ उठाई।
  • उनका मानना है कि “पुराना सिस्टम” अब पूरी तरह विफल हो चुका है।
  • इसी कारण वे नए और साफ-सुथरे चेहरों को सामने लाना चाहते हैं।

सुशीला कार्की और संवैधानिक विवाद

पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की का नाम भी चर्चा में आया। वे नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकी हैं और उनकी छवि ईमानदार व सख्त जज की रही है।

लेकिन संवैधानिक कारणों से उनके नाम पर विवाद हुआ:

  • नेपाल के संविधान में 70 वर्ष से ऊपर की उम्र वाले व्यक्ति को संवैधानिक पदों पर बैठाने में अड़चनें हैं।
  • कार्की की उम्र इस सीमा से पार है।
  • कई राजनीतिक दलों और संवैधानिक विशेषज्ञों ने उनके नाम पर आपत्ति जताई।

Nepal’s Political Crisis: दुर्गा प्रसाई की मौजूदगी

बैठक में समाजसेवी और विवादित चेहरे दुर्गा प्रसाई भी शामिल थे।

  • वे हाल ही में कई बार राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय दिखे हैं।
  • उन्हें Gen-Z आंदोलन से जोड़कर भी देखा जाता है।
  • हालांकि उनके नाम को अंतरिम पीएम पद के लिए गंभीरता से नहीं लिया गया।

कुलमन घिसिंग का नाम क्यों आगे आया?

Gen-Z ने कुलमन घिसिंग का नाम अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में सुझाया।

  • घिसिंग नेपाल बिजली प्राधिकरण के प्रमुख रह चुके हैं।
  • उन्होंने बिजली संकट खत्म करके देशभर में लोकप्रियता हासिल की।
  • उनकी छवि ईमानदार, कुशल और गैर-राजनीतिक है।
  • यही कारण है कि युवाओं और आम जनता के बीच वे भरोसेमंद नेता माने जाते हैं।

युवाओं का मानना है कि एक ऐसा अंतरिम पीएम चाहिए जो राजनीतिक दलों का हिस्सा न हो, बल्कि जनता का प्रतिनिधि लगे।

बैठक को लेकर युवाओं की नाराज़गी

हालांकि Gen-Z प्रतिनिधि आर्मी हेडक्वार्टर पहुंचे, लेकिन बाहर प्रदर्शन कर रहे युवाओं ने इस जगह को लेकर सवाल उठाए।

  • उनका कहना था कि बातचीत राष्ट्रपति भवन या सार्वजनिक जगह पर होनी चाहिए।
  • आर्मी मुख्यालय में बातचीत होना उन्हें “पर्दे के पीछे की डील” जैसा लगा।
  • कई युवाओं ने कहा कि यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है।

राष्ट्रपति की भूमिका

नेपाल के राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल भी इस पूरी प्रक्रिया पर नज़र रखे हुए हैं।

  • सेना प्रमुख ने उन्हें टेलीफोन पर बैठक की जानकारी दी।
  • राष्ट्रपति ने कहा कि समाधान संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से ही होना चाहिए।
  • फिलहाल, अंतरिम सरकार बनाने की कवायद में राष्ट्रपति की भूमिका अहम साबित हो सकती है।

भारत और चीन की नजरें

नेपाल का राजनीतिक संकट केवल घरेलू मामला नहीं है।

  • भारत चाहता है कि नेपाल में स्थिर और लोकतांत्रिक सरकार बने ताकि रिश्ते मजबूत रहें।
  • चीन भी नेपाल की राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखता है। वह नहीं चाहता कि नेपाल पूरी तरह भारत के पाले में चला जाए।
  • ऐसे में अगला पीएम तय करना केवल घरेलू राजनीति नहीं, बल्कि कूटनीति से भी जुड़ा हुआ है।

आर्थिक संकट और जनता की उम्मीदें

नेपाल की अर्थव्यवस्था इस समय कमजोर स्थिति में है।

  • बेरोज़गारी, महंगाई और पर्यटन उद्योग की गिरावट सबसे बड़ी समस्याएँ हैं।
  • जनता को लगता है कि नया नेतृत्व पारदर्शी और ईमानदार होना चाहिए।
  • अगर फिर से पुराने नेता सत्ता में आए, तो संकट और गहरा जाएगा।

आगे के संभावित रास्ते

  1. कुलमन घिसिंग को अंतरिम पीएम बनाना – युवाओं की मांग है और वे जनता में लोकप्रिय भी हैं।
  2. गठबंधन सरकार – राजनीतिक दल मिलकर अंतरिम पीएम तय करें।
  3. नए चुनाव – अगर सहमति नहीं बनी तो जल्दी चुनाव कराए जा सकते हैं।

निष्कर्ष

नेपाल का संकट इस बार केवल सत्ता की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह एक जनता बनाम पुराना सिस्टम का संघर्ष है। Gen-Z ने साफ संदेश दिया है कि अब पुराने नेताओं की राजनीति नहीं चलेगी।

आर्मी हेडक्वार्टर में हुई बैठक ने अंतरिम प्रधानमंत्री चुनने की प्रक्रिया को नया मोड़ दिया है। अब देखना यह है कि क्या कुलमन घिसिंग जैसे गैर-राजनीतिक और साफ छवि वाले नेता को मौका मिलता है या फिर पारंपरिक पार्टियाँ अपनी पकड़ बनाए रखती हैं।

नेपाल के लोकतांत्रिक भविष्य का फैसला आने वाले कुछ दिनों में तय हो सकता है।

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